Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
चिदाभासादृते नास्तीत्येकता सम्यगीक्षणम् ।
त्वमहंतादिसंसार इति मे न दिशो दश ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
त्वम् (अपने से भिन्न दूसरा चेतन), अहम् (अपनी
देह के सदृश परिच्छिन्न चेतन) आदि स्वरूप संसार और उनकी आधारभूत दसों दिशाएँ ये सब दृश्य
मुझसे पृथक दूसरे नहीं हैं, किन्तु स्वप्रकाश आत्मस्वरूपभूत ही हैं और दूसरा तो एकमात्र आभास ही
है, इस प्रकार का जो ज्ञान है, उसे विद्वान लोग सम्यकृज्ञान कहते हैं