Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
सर्वं स्वाभासमेवेति सम्यगालोकनं विदुः ।
सदसन्मयसंसारे यथा भूतार्थदर्शनात् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
सम्यकृज्ञान का फल कहते हैं।
सत् और असद्रूप संसार में यानी ब्रह्म और माया दोनों से जनित विषयकलापों में यथाभूत
आत्मतत्त्वदर्शनरूप सम्यकृज्ञान से मन न उदित होता है और न अस्त ही होता है