Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
इदं हि जगतां जालं किमत्र परिदेवना ।
सत्सदेव सदैवैतदसदेवासदेव हि ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो त्रिकालाबाधित सत्यरूप वस्तु है, वह सदा ही
सत्यस्वरूप है और जो असत्यरूप वस्तु है, वह सदा ही असत्स्वरूप है, वह कभी भी सद्रूपता को प्राप्त
नहीं होती, इसलिए मायारूप विकृति के वैचित्र्य से प्रतीयमान इस प्रपंच में ऐसी दूसरी कोन वस्तु है,
जिसके विषय में शोक किया जाय ?