Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
अर्थायाता भवत्यापच्छोकस्यावसरो हि कः ।
बृंहत्युदेति स्फुरति बुद्बुदौघ इवार्णवे ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्र में बुद्बुदों का
समूह; फिर इस विषय में शोक ही क्या ?