Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
प्राप्तव्यं पुरुषेणेति हर्षस्यावसरो हि कः ।
सर्वस्यैव हि संसारे नरस्य व्यवहारिणः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस संसार में व्यवहार कर रहे सभी मनुष्यों को
दरिद्रता आदि आपदाएँ आनुषंगिकरूप से प्राप्त हुआ ही करती हैं, फिर शोक का अवसर क्या ?