Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
पदं कुर्वन्ति दग्धासु स्थलीषु हरिणा इव ।
रागो द्वेषश्च सर्पौ द्वौ न विलीनौ मनोविले ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय श्रीरामजी, जिस पुरुष के चित्तरूपी बिल में राग और द्वेषरूपी
दो सर्प तिरोहित नहीं हो जाते, उस पुरुष को पूर्वोक्त कल्पवृक्ष से भी क्या दुःखरूप फल प्राप्त नहीं
होते ? (यानी ऐसे पुरुष को उस कल्पवृक्ष से भी दुःख प्राप्त होते ही रहेंगे, यह भाव है ।)