Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 81
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
किमेतेषु नरः प्राज्ञो रज्यते वा विरज्यते ।
भावाभावभवाभोगा मायेयं पारमेश्वरी ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसमें संसार की परिपूर्णरूपता प्रिय विषयों के
अस्तित्व ओर अप्रिय विषयों के अभाव से ही बनी है ऐसी, समस्त संसार की रचनारूप यह परमेश्वर
सम्बन्धिनी माया आसक्त पुरुषों को ही भली प्रकार से अनर्थ-गर्तो में ढकेल देती है