Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verses 94–95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verses 94–95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
न ते जन्म न ते दुःखं न दोषास्ते न ते भ्रमाः ।
सर्वं संकल्पमुत्सृज्य तिष्ठात्मनि सुसंस्थितः ॥ ९४ ॥
परिगलितविकल्पदोषजालस्त्वमसि सुसारसुषुप्तसौम्यदृष्टिः ।
अतिविततमिदं सुशुद्धये त्वं समुपशमात्मनि तिष्ठ हे महात्मन् ॥ ९५ ॥
हिन्दी अर्थ
उपसंहार करते हैं।
हे महात्मन्, आपके समस्त संकल्प-विकल्पात्मक दोषों का समूह नष्ट हो चुका है, उत्तम सारभूत
सुषुप्तिसदृश विक्षेपरहित दृष्टि भी आपने प्राप्त कर ली है, वास्तव में आप नित्य अपरोक्ष स्वभाव
व्यापक परम ब्रह्मस्वरूप ही हैं। अतः उत्तम शुद्धि के लिए आप अपने आत्मस्वरूप में ही समाहित होकर
स्थित हो जाइए