Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 104
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 104 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 104
संस्कृत श्लोक
तत्रोपविष्टं प्रोवाच मामर्धेन्दुकलाधरः ।
ब्रह्मन्प्रशमशालिन्यः प्राप्तविश्रान्तयः पदे ॥ १०४ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि पहले कुशल प्रश्न ही किया जाता है, तथापि समस्त कुशलता की परम सीमाभूत परमात्मा
में चित्त- विश्रान्ति का ही, अनुग्रह करने की इच्छा से, भगवान पहले प्रश्न करते हैं।
भगवान उमापति ने कहा : हे ब्रह्मन्, सर्वविध सांसारिक उपद्रवं के उपशम से विराजित, परमात्मरूप
पर (ब्रह्म) वस्तु में विश्रान्ति ले रही तथा मोक्षरूप उत्तम कल्याण देनेवाली तुम्हारी चित्तवृत्तिर्यो अपने
स्वरूप में अवस्थित तो हैं ?