Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 108
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 108 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 108
संस्कृत श्लोक
न किंचिदपि दुष्प्रापं न च काश्चन भीतयः ।
त्वदनुस्मरणानन्दपरिघूर्णितचेतसाम् ॥ १०८ ॥
हिन्दी अर्थ
आपके निरन्तर स्मरण से जनित आनन्द से जिनका चित्त चारों ओर से घूर्णित
(मत्त) हो गया है, ऐसे पुरुषों के लिए इस जगत्कोश में वे प्राणी ही नहीं हैं, जो उन्हे प्रणाम नहीं करते
अर्थात् सभी उन्हे प्रणाम करते हे