Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 107
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 107 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 107
संस्कृत श्लोक
गिरानुनयशालिन्या मयोक्तं रघुनन्दन ।
त्र्यक्षानुस्मृतिकल्याणवतामिह महेश्वर ॥ १०७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महेश्वर, देवाधिदेव त्रिनेत्र की निरंतर स्मृति से प्राप्त हुए उत्तम
कल्याण से सम्पन्न पुरुषों के लिए इस संसार में कोई भी वस्तु न तो दुष्प्राप्य है ओर न किसी तरह का
भय ही हैँ