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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

इमे देहा भ्रमन्तीह सर्वधर्मात्समुत्थिताः । संकल्पः पुनरस्त्वेव देहस्यार्थे कदाचन ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, एकमात्र देह के विनाश से इष्ट सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योकि देह के नष्ट हो जाने पर भी देह परम्परा का उत्पादक संकल्प तो फिर भी विद्यमान रहता ही है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को देह के लिए सुख-दुख की चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिए, किन्तु संकल्पोच्छेद के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए