Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 129
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 129 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 129
संस्कृत श्लोक
आत्मसंवित्तिरूपं तु त्यक्त्वा देवार्चनं जनाः ।
कृत्रिमार्चासु ये सक्ताश्चिरं क्लेशं भजन्ति ते ॥ १२९ ॥
हिन्दी अर्थ
जो मनुष्य आत्मज्ञानरूप
देवार्चन छोड़कर कृत्रिम पूजनों में ही आसक्त रहते हैं, वे चिरकालतक क्लेश ही पाते हैं