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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 132

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 132 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 132

संस्कृत श्लोक

त्वमेतच्चेतनाकाशमात्मानं जीवमव्ययम् । स्वभावं विद्धि न त्वन्यः पूज्यः पूजात्मपूजनम् ॥ १३२ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वसिष्ठजी, आप जीव को अपरोक्ष चेतनाकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम ब्रह्मस्वरूप ही जानिए, एकमात्र वही पूज्य है; दूसरा कोई आत्मा से अतिरिक्त पूज्य नहीं हे । अतः आत्मपूजा ही पूजा है (७)