Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 134
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 134 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 134
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
चिद्व्योमैव किलास्तीह पारावारविवर्जितम् ।
सर्वत्रासंभवच्चेत्यं यत्कल्पान्तेऽवशिष्यते ॥ १३४ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त चेत्य पदार्थों का प्रलय हो जानेपर भी (चित्सत्ता' ज्यों की त्यो बनी रहती है, इससे (चित्सत्ता
चेत्य पदार्थो के अधीन नहीं है“ यह बात भलीभाँति सिद्ध हो चुकी है, अतः चित् के अधीन भासमान
चेत्य का जिस प्रकार चिति से भिन्न दूसरा भान मानना युक्त नहीं है, उसी प्रकार वित्सत्ता के अधीन
चेत्य की चितिसत्ता से पृथक सत्ता मानना भी युक्त नहीं है, ऐसी उपपत्ति बतलाते हैं।
ईश्वर ने कहा : चूँकि यहाँ सर्वत्र आर-पार से रहित-सर्वविध परिच्छेदं से शून्य-चेत्यनिर्मुक्त
चिदाकाश ही विद्यमान है, इसलिए कल्पान्त में भी वह अवशिष्ट रहता हे ((चिदाकाश सर्गकाल में भी
चेत्यशून्य है, पार आदि परिच्छेदशून्य होने से, प्रलयकाल के समान इस प्रकार अनुमानरूप उपपत्ति
यहाँ बतलाई गई है, ऐसा समझना चाहिए ।)