Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 135–136
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 135–136 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 135
संस्कृत श्लोक
यद्यत्स्वयं प्रकचति तस्य स्वकचनस्य तु ।
स्वयं यत्स्पन्दितं नाम तेनेदं जगदित्यलम् ॥ १३५ ॥
इत्येवं स्वप्नपुरवज्जगद्भाति चिदात्मकम् ।
एवं चिद्व्योममात्रात्म जगदच्छं न भित्तिमत् ॥ १३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब जगद्रूप प्रतिभास कैसे होता है ? इस पर कहते हैं।
सूर्य, चन्द्र, दीपक, इन्द्रिय, मन आदि जो-जो स्वयं प्रचुरप्रकाशवाले पदार्थ हैं, उनके अपने प्रकाश
का अपने बिम्ब में समा न सकने के कारण स्वयं जो बिम्ब से बाहर प्रभाकर से-स्पन्दित यानी स्पन्दन-
सा प्रसिद्ध है, वही नील, पीत आदि उसका विषयभूत जगत है। इसी प्रकार चिद्व्योम के अपरिच्छिन्न
(७) इस विषय में विद्वानों का अनुभवपूर्ण यह वचन है :
देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सदाशिवः । त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् ॥
देह ही देव-मन्दिर है ओर उसमें विराजमान जीव ही सदाशिवस्वरूप देवता है उस पर से
अज्ञानरूपी निर्माल्य हटा देना चाहिए और "सोऽहं इस रूप से उसकी पूजा करनी चाहिए ।
होने से मायारूप आवरण के भीतर न समा सकने के कारण उसका मायिक वासना आदि मार्ग से जो
एक तरह का स्पन्दन-सा प्रसिद्ध है, उसीसे यह जगत दिखलाई पड़ता है