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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 137–138

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 137–138 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 137

संस्कृत श्लोक

अत्यन्तासंभवाच्चेत्यं दृश्यं चिद्व्योममात्रकम् । चित्त्वात्कचति सर्गादौ यत्तज्जगदिति स्मृतम् ॥ १३७ ॥ तस्मात्स्वप्नपुराकारं यदिदं भासते जगत् । तत्र चिद्व्योममात्रात्मन्यन्यता नाम का कुतः ॥ १३८ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त रीति से एकमात्र चिदात्मस्वरूप ही सिद्ध हो रहा विचित्ररूप यह जगत स्वप्ननगर के सदृश भ्रान्ति से प्रतीत होता हे । मेरी कथित रीति से परमार्थबुद्धि से विचार करने पर तो जगत का कोई स्थान ही सिद्ध नहीं होता, वास्तव में वह अमूर्तं एवं स्वच्छ चिदाकाशमात्रस्वरूप ही है ॥१३ ६॥ तब क्या चिति ही चेत्य के आकार में परिणत अपने को देखती है ? इस शंका पर नहीं, ऐसा उत्तर देते हैं। अपरिणामी ओर अद्वय होने से चैतन्य का परिणाम चेत्य हो ही नहीं सकता, अतः अत्यन्त असम्भव चेत्य भी आवृत चित्‌-स्वभाव से पृथक जो सृष्टि के आदि में चिदाकाशमात्रस्वरूप भासता है, वही दृश्य-जगत है, ऐसा मुनियों का स्मरण है