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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 139

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 139 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 139

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रमेव गिरयश्चिन्मात्रं जगदम्बरम् । चिन्मात्रमात्मा जीवश्च चिन्मात्रं भूतसंततिः ॥ १३९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए स्वप्न-नगर के सदुश जो यह जगत भासता है, उस चिदाकाशमात्रस्वरूप जगत में भिन्नता का अवकाश ही कहाँ है २।१३८॥ अतएव आरोपित रूप के चिन्मात्रस्वरूपता का प्रत्यक्ष करना चाहिए, यह कहते है । चिन्मात्रस्वरूप ही पर्वत हैं, चिन्मात्र ही जगत ओर आकाश है, चिन्मात्ररवरूप आत्मा एवं जीव है तथा भूतो की परम्परा भी चिन्मात्रस्वरूप ही है