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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 145

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 145 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 145

संस्कृत श्लोक

यतो न संभवत्यन्यच्चेत्यं किंचित्ततोऽखिलम् । चित्तं संचेत्यमप्येतदचेत्यं सज्जगत्स्थितम् ॥ १४५ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि चित्‌ से भिन्न दूसरा कुछ भी चेत्यपदार्थ नहीं हो सकता, इसलिए चित्त और चेत्यात्मक समस्त जगत भी अचेत्यात्मक एकमात्र चिन्मात्रस्वरूप होकर ही स्थित है