Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 144
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 144 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 144
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नपुरे चित्खं वर्जयित्वेतरत्क्वचित् ।
न किंचित्संभवत्येवं जाग्रत्येवं महाचितः ॥ १४४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार स्वप्न-नगर में चिदाकाश को
छोडकर दूसरा कुछ भी पदार्थ कहीं नहीं रहता, उसी प्रकार जाग्रत-काल में भी महाचैतन्य आकाश को
(59) भूताकाश, अव्याकृत आकाश आदि तीन अर्थो का ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त हुए तीनों भी
आकाशशब्द “काश्र-दीप्तौ” इस धातु से बनाये गये हैं इसलिए उनका जिस प्रकार चैतन्यरूप अर्थ
हो सकता है, उसी प्रकार “जो गमनार्थक धातु होते हैं, वे ज्ञानार्थक भी हैं, इस व्याकरण-नियम के
आधार पर “गम' धातु से “वर्तमाने पृशद०" इत्यादि सूत्र से क्रिपप्रत्यय होने पर निष्पादित जगतशब्द
भी चैतन्यार्थक हो सकता है । अतः उपर्युक्त शब्द एक दूसरे के पर्याय हैं - यह कहा गया है, वह
ठीक ही है।
छोड़कर और कुछ भी दूसरा पदार्थ कहीं नहीं रहता