Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 143
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 143 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 143
संस्कृत श्लोक
यथैतत्संविदाकाशं स्वप्ने भाति जगद्वपुः ।
तथेदं जाग्रदाख्येऽपि स्वप्ने भाति तदेव नः ॥ १४३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार स्वप्न में चिदाकाश ही जगद्रूप भासता है, उसी प्रकार जाग्रत-नामक स्वप्न में भी वही
चिदाकाश जगत्-रूप से हम लोगों को भासता है