Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 142
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 142 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 142
संस्कृत श्लोक
एवं द्वौ स्वप्नसंकल्पमायाभिः स्वनुभूयते ।
तदा किल चिदाकाशमेव भाति जगत्तया ॥ १४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से जब तत्त्ववेत्ता द्वारा स्वप्न, संकल्प
और माया के सदृश मिथ्या द्वैत अनुभूत होताहे, तव उसे चिदाकाश ही जगद्रूप से प्रतीत होता हे