Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 148
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 148 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 148
संस्कृत श्लोक
शुद्धसंवित्तिमात्रत्वादृतेऽन्यत्स्वप्नपत्तने ।
यथा न विद्यते किंचित्तथास्मिन्भुवनत्रये ॥ १४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्नकालीन
प्रतिभासमात्रस्वरूप नगर में विशुद्धचैतन्यमात्ररूप आत्मा को छोड़कर दूसरा कुछ भी तात्त्विक पदार्थ
नहीं है, वैसे ही इन तीनों भुवनों मे आत्मस्वरूप विशुद्ध चैतन्यपदार्थ को छोड़कर दूसरा कुछ भी पदार्थ
नहीं है