Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसंकल्पजाद्देहादपि तुच्छतरो ह्ययम् ।
अल्पसंकल्पजो दीर्घैः सुखदुःखैर्न गृह्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, स्वप्न आदि शरीर स्वल्पकालीन संकल्प से जनित होने के कारण
दीर्घ-कालीन सुख-दुः:खों से आक्रान्त नहीं होता। यह प्रत्यक्ष शरीर तो दीर्घकालीन संकल्प से जनित
होने के कारण दीर्घकाल के दुःखों से आक्रान्त रहता है