Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
दीर्घसंकल्पजश्चायं दीर्घदुःखेन दुःखितः ।
देहो हि संकल्पमयो नायमस्ति न वास्ति नः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्पविकार यह शरीर न तो स्वयं है
और न हम लोगों का सम्बन्धी (आत्मा का सम्बन्धी) ही है, अत: इस शरीर के निमित्त यह अज्ञानी जीव
निरर्थक क्लेश का भाजन क्यों बनता है ?