Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
किं व्यर्थमेतदर्थं हि मूढोऽयं क्लेशभाजनम् ।
यथा चित्रमये पुंसि क्षते क्षीणे न तत्क्षतिः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अतः चित्र आदि के शरीरो की क्षति के सदश इस शरीर की क्षति के विषय में भी शोक नहीं करना
चाहिए, ऐसा कहते हैं।
भद्र, जिस प्रकार चित्र में लिखित पुरुष के क्षत या क्षीण हो जाने पर आत्मा की क्षति नहीं होती,
उसी प्रकार संकल्प से जनित पुरुष के क्षत या क्षीण हो जाने पर आत्मा की कुछ भी क्षति नहीं
होती