Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
तत्रस्थेन तथैवेदं दृश्यते देहचक्रकम् ।
भ्रमितं च भ्रमदूपं पतद्रूपं प्रपातितम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उसी अज्ञानरूपी
चक्र के ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देह परम्परारूपी चक्र को देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर
अधिक भ्रान्ति को देनेवाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख स्वरूप से ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तो
में गिराया गया, हत एवं हन्यमान रहता है