Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
संकल्पेन कृतो देहो मिथ्याज्ञानेन सन्नसन् ।
असत्येन कृतं यस्मान्न तत्सत्यं कदाचन ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मिथ्या अज्ञान
के द्वारा एकमात्र संकल्प से उत्पन्न हुआ यह शरीर प्रातीतिक रूप से सत्य-सा होने पर भी वास्तव
में असत्य ही है, क्योंकि जो वस्तु अज्ञान आदि से उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं
हो सकती