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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

अस्मिन्नसन्मये देहगृहे शून्ये समुत्थिते । सत्तामुपगते मिथ्याबालकल्पितयक्षवत् ॥ ३८ ॥ कुतोऽप्यागत्य निःसारः सर्वसज्जनवर्जितः । अहंकारः कुवेतालः प्रविष्टश्चित्तनामकः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

देह में सत्यबुद्धि होने पर तो देहाभिमानरूप अहंकार के आ जाने के कारण उसकी दासता बनी ही रहेगी, ऐसा कहते है । इस असद्रूप संकल्पजनित देहरूप शून्य घर का अस्तित्व सिद्ध हो जाने पर उसमें अज्ञानी बालक द्वारा कल्पित असत्य यक्ष के सदुश, चित्तनामक अहंकाररूप दुष्ट वेताल, जो निस्तत्त्व एवं समस्त सज्जनो की संगति से वर्जित हे, कहीं से भी आकर, प्रविष्ट हो जाता है