Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 43–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
चित्तवेतालमुद्वास्य स्वशरीरकमन्दिरात् ।
संसारशून्यनगरे न बिभेति कदाचन ॥ ४३ ॥
चित्तभूताभिभूतेऽस्मिन्ये शरीरगृहे रताः ।
चित्रमद्यापि ते कस्माद्धटिता आत्मवत्स्थिताः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने तुच्छ शरीररूपी मन्दिर से चित्तरूपी वेताल को हटा देने से इस संसाररूपी शून्य नगर
में पुरुष कभी भी नहीं डरता