Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अहंकारबृहद्यक्षगृहे दग्धशरीरके ।
विहरन्नास्थया साधो न तु वै तत्किल स्थिरम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे साधो, अहंकाररूपी बड़े यक्ष के घररूपी त्रिविध तापरूप अग्नि से दग्ध हुए
शरीर में आसक्ति से विहार कर रहा पुरुष पिशाच ही है, क्योकि वह शरीर स्थिर नहीं है