Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
अहंकारानुचरतां त्यक्त्वा विततया धिया ।
अहंकारास्मृतिं प्राप्य स्वात्मैवाश्ववलम्ब्यताम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले
विशद बुद्धि से अहंकार की दासता छोडकर तदनन्तर योगभूमिका के अभ्यास से अहंकार का आत्यन्तिक
विस्मरण कर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्मा का ही अवलम्बन करना चाहिए