Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
अवधूतो ह्यवज्ञातश्चेतसैव तिरस्कृतः ।
अहंकारपिशाचस्ते नेह किंचित्करिष्यति ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल न देखने से ही क्या होगा। इस पर कहते हैं।
हे श्रीरामजी, चित्त से ही बुरी तरह फटकारा गया, अपमानित तथा तिरस्कृत हुआ यह अहंकाररूपी
पिशाच यहाँ तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता