Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
अहंकारपिशाचोऽस्मिन्देहे तिष्ठतु यातु वा ।
त्वमेनमालोकय मा मनसा महतां वर ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महान व्यक्तियों में श्रेष्ठ रामभद्र, इस देह में अहंकाररूपी पिशाच रहे अथवा
चला जाय, परन्तु आप उसकी ओर मन से तनिक भी दृष्टिपात न कीजिए