Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
अहंकारोरगो यस्य परिस्फूर्जति कोटरे ।
स्वदेहपादपोऽधीरैरचिरेण निपात्यते ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस अपनी देहरूपी वृक्ष के कोटर में यानी हृदय में अहंकाररूपी
सर्प चारों ओर फूत्कार करता रहता है, वह स्वदेहरूपी वृक्ष अधीर पुरुषों द्वारा तत्काल ही काटकर गिरा
दिया जाता है