Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
संरोधितायां वहनाद्रघुनन्दन रुद्ध्यते ।
क्षोभितायां मनोनाभ्यामिदं संसारचक्रकम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, संकल्पात्मक मनोरूप
नाभि को रागद्वेष आदि से विक्षोभित-भ्रमित यानी नचाये जाने पर यह संसाररूपी चक्र, प्रयत्न से रोके
जाने पर भी, वेगपूर्वक नाचता ही रहता है