Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
एवमेवावलम्ब्यार्थं तिष्ठ नेह पदं कृथाः ।
इदं संसारचक्रं हि नाभौ संकल्पमात्रके ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें उपाय बतलाते हैं।
हे रघुनन्दन, यह संसाररूपी चक्र भ्रमण से तभी रुक जाता है, जब कि एकमात्र संकल्परूपी नाभि
का (पहिये के मध्य भाग का) भलीप्रकार अवरोध किया जाता है