Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
पुनराह तमेवार्थं वसिष्ठो वदतां वरः ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
राम सम्यक्प्रबुद्धोऽसि स्वात्मानमसि लब्धवान् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, आप भली प्रकार तत्त्वज्ञानी हो चुके हैं, अपनी
आत्मा को प्राप्त कर चुके हैं, अतः इसी रीति से इस परमार्थ तत्त्व का अवलम्बन कर विश्राम कीजिए,
इस तुच्छ संसार में आस्था मत कीजिए