Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
आत्मसंनिधिमात्रेण स्फुरत्यात्तवपुर्मनः ।
दीपसंनिधिमात्रेण कुड्यरूपमिवामलम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
उपचार में हेतु मन आदि में सत्ता एवं स्फूर्ति का प्रदान करना ही है, यह कहते हैं।
एकमात्र आत्मा की सन्निधि से ही सत्ता प्राप्त करनेवाला या स्थूल देह की कल्पना करनेवाला मन
उस प्रकार स्फुरित होता है, जिस प्रकार एकमात्र दीपक की सन्निधि से निर्मल भीत का रूप प्रकाशित
होता है