Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 62–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
अपि विश्लिष्टयो राम नित्यमेवात्मचित्तयोः ।
द्यावापृथिव्योरिव कः संबन्धः प्रकटान्धयोः ॥ ६२ ॥
चपलस्पन्दनेराभिरात्मशक्तिभिरावृतम् ।
चित्तमात्मेति मौर्ख्येण दृश्यते रघुनन्दन ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, निरन्तर दूर रहनेवाले चैतन्यरूप ओर जडरूप आत्मा एवं चित्त का,
पृथिवी ओर आकाश की नाई, कौन-सा सम्बन्ध हो सकता है २