Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
आत्मा प्रकाशरूपो हि नित्यः सर्वगतो विभुः ।
चित्तं शठमहंकारं विद्धि हार्दं बृहत्तमः ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका हो कि आत्मा का मन आदि के साथ यदि सम्बन्ध न होगा, तो उनमें सत्ता का स्फुरण ही नहीं
हो सकेगा । सम्बन्ध होनेपर तो आत्मा मे असंगत्व ही सिद्ध नहीं होगा ? इस पर कहते है ।
हे रघुनन्दन, अत्यन्त चंचल स्पन्दनं की प्रेरणा करनेवाली प्राणशक्तियों से वशीकृत चित्त
अभेदाध्यासरूप मूर्खता से (अज्ञान से) ही “चित्त आत्मा है"-य प्रतीत होता है, वस्तुतः नहीं ॥६ ३॥
असंगत्व का उपपादन करने के लिए विरोध का ही सविस्तार निरूपण करते हैं।
भद्र, यह जो आत्मा है, वह प्रकाशस्वरूप, चैतन्यरूप, अविनाशी, सर्वत्र विद्यमान और व्यापक है
तथा अहंकाररूप चित्त तो वंचक और हृदयवर्ती सबसे बड़ा अन्धकार हे, यह आप जानिए