Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
आत्मासि वस्तुतस्त्वं हि सर्वज्ञो न मनो भृशम् ।
दूरे कुरु मनोमोहं किमेतेनाभिसंगतः ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, वस्तुतः आप सर्वज्ञ आत्मस्वरूप ही है, मनोरूप नहीं इसलिए तत्काल ही मनोरूप मोह को
अत्यन्त दूर कर दीजिए, क्योकि निरर्थक ही आपने उसके साथ संगति कर रक्खी है