Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
भवप्रदमकल्याणं धैर्यसर्वस्वहारिणम् ।
मनःपिशाचमुत्सृज्य योऽसि स त्वं स्थिरो भव ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, संसार को
देने तथा धैर्यरूपी सर्वस्व को चुरा लेने वाले अभद्र, मनरूपी पिशाच का परित्याग कर जिस विशुद्ध
चैतन्य स्वरूपवाले आप हैं, उसी स्वरूप से स्थिर हो जाइए