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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verses 72–73

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verses 72–73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 72

संस्कृत श्लोक

जगन्नगर्यामस्यां तु शान्तचित्तपिशाचकम् । देहगेहं कतिपयैः सेव्यते सद्भिरेव यत् ॥ ७२ ॥ इह संश्रूयते या या दिक् सैव रघुनन्दन । प्रमत्तमोहवेतालैः पूर्णा देहश्मशानकैः ॥ ७३ ॥

हिन्दी अर्थ

उपर्युक्त श्लोक में समस्त” यह जो कहा गया है, वह उत्सर्ग है, क्योंकि उससे विपरीत भी कहीं पर देखा जाता है, ऐसा कहते हैं। क्योंकि, जिसमें से चित्तरूपी पिशाच प्रशान्त हो गया है ऐसे-देहरूपी घर की, इस जगतरूपी नगरी में कुछ इने-गिने सज्जन ही सेवा करते हैं