Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 71
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 71
संस्कृत श्लोक
चित्तवेतालवलिता समस्ता देहखण्डजा ।
इयं जगदरण्यानी शून्या कस्य न भीतये ॥ ७१ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, चित्तरूपी वेताल से वेष्टित तथा देहरूपी छोटे भाग में उत्पन्न
(&) किस इच्छा से प्रेषित हुआ मन विषयों की ओर दौडता है, पहले किससे प्रेरित हुआ प्राण
अपने व्यापार के प्रति उद्यत होता है“, “जो प्राणवृत्ति को हृदय से ऊपर की ओर ले जाता है और
अपान को नीचे की ओर ले जाता है, उस हृदयाकाश में प्रकाशमान भजनीय देव की सब चक्षु आदि
उपासना करते हैं ।
हुई, शून्य यह समस्त जगद्गूपी बड़ी वनभूमि किसे भयभीत नहीं करती ? (अर्थात् सभी उससे भयभीत
हो जाते है ।)