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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

निःस्नेहदीपवच्छान्तो यस्यान्तर्वासनाभरः । तेन चित्रकृतेनेव जितं ज्ञेनाविकारिणा ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका तेल आदि स्नेह से शून्य दीपक की नाई अनन्त वासनासमूह विनष्ट हो चुका है, उसने सब रागादि के ऊपर विजय पा ली ऐसा समझना चाहिए | (तब क्या वह विजय सत्य है ? नहीं, ऐसा कहते हैं ॥) यथार्थ में जय-विजय भी काल्पनिक हैं, जिस प्रकार चित्र मेँ लिखित शत्रु के सिर का छेदन कर रहा चित्रित राजा अपने शत्रु पर विजय पाता है, उसी प्रकार अविकारी ज्ञानी भी विजय पाता है