Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
महातरङ्गगम्भीरभासुरात्मचिदर्णवः ।
रामाभिधोर्मिस्तिमितः समसौम्योऽसि व्योमवत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
रामनामक ऊर्मियों से प्रसन्न, एकरूप, आकाश की नाई सोम्य, बड़ी-
बड़ी सृष्टिरूपी जल लताओं से घन तथा प्रकाशमय आत्मचैतन्यरूप समुद्र आप ही हैं। रमन्ते योगिनो
यस्मिन्नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनाऽसौ परं ब्रह्माऽभिधीयते ॥ (जिस नित्यानन्द चिदात्मा में
योगी लोग निरन्तर रमण करते हैं, वह परब्रह्म राम पद से कहा जाता है) ऐसी व्युत्पत्तिवाले अन्वर्थ राम
भी आप ही है, यों "रामाभिधोर्मिरितमित' से कहा गया है