Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 3, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 3, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 5, 6
संस्कृत श्लोक
यथा न भिन्नमनलादौष्ण्यं सौगन्ध्यमम्बुजात् ।
कार्ष्ण्यं कज्जलतः शौक्ल्यं हिमान्माधुर्यमिक्षुतः ॥ ५ ॥
आलोकश्च प्रकाशाङ्गादनुभूतिस्तथा चितेः ।
जलाद्वीचिर्यथाऽभिन्ना चित्स्वभावात्तथा जगत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अव दुश्यपदार्थद्रष्टा से पृथक् नहीं है, इसकी दरष्टा के धर्मरूपता के उपपादनमुख से सिद्धि करते हैं ।
जिस प्रकार अग्नि से उष्णत्व भिन्न नहीं है, कमल से सुगंधि भिन्न नहीं हे, काजल से श्यामरूप
भिन्न नहीं हैं, बरफ से शुक्लरूप भिन्न नही है, गन्ने से माधुर्य भिन्न नहीं है, तेज से प्रकाश भिन्न नहीं
है, चिति से वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य भिन्न नहीं है, जल से तरंग भिन्न नहीं है, उसी प्रकार चित्स्वभाव
ब्रह्म से जगत भिन्न नहीं हे