Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 100
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verse 100 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 100
संस्कृत श्लोक
चिच्चिनोति यथात्मानं येन यत्र यदा यदा ।
तत्तथानुभवत्यम्बु स्पन्दाद्वीच्यादितां यथा ॥ १०० ॥
हिन्दी अर्थ
चिति जब-जब जहाँ पर जिस भाव से जिस तरह अपनी
आत्मा का विवर्त द्वारा उपचय करती है, तब-तब वहीं पर उसी भाव का अनुभव उस तरह ऐसे करती है
जैसे जल स्पन्द से तरंग आदि रूपता का अनुभव करता हे