Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 101–103
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 30, verses 101–103 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 101-103
संस्कृत श्लोक
हंसी क्रौञ्ची बकी काकी सारसी तुरगी वृकी ।
बकी बलाका हरिणी वानरी किन्नरी शुनी ॥ १०१ ॥
वटीका पिङ्गली शाली मक्षिका भ्रमरी शुकी ।
धीः श्रीर्ह्रीः प्रीती रतिश्च शंबरी शर्वरी शशी ॥ १०२ ॥
एतास्वन्यासु चान्यासु परिभ्रमति योनिषु ।
विवर्तमानसंसारे जलावर्ते तृणं यथा ॥ १०३ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्हीं भावो का फिर विस्तारपूर्वक निरूपण करते है ।
यह चिति हंसी, क्रौची, बगुली,काकी, सारसी, घोड़ी, वृकी, ऊँचे पैर ओर चोचवाली भिन्न जाति
की वगुली, अत्यन्त धवल तूल कण्ठ जाति की बलाका, हिरनी, वानरी, किन्नरी, कुत्ती, वटिका,
पिंगली, मेना, मक्खी, भोरी, सुग्गी, धी, श्री, लज्जा, प्रीति, रति, माया, रात्रि ओर शशी इन तथा
इनसे भिन्न अन्यान्य योनियं मे यानी देह-विशेषों में इस विवर्तमान संसार में उस प्रकार घूमती रहती
है, जिस प्रकार जलावर्त में तिनका